Advanced International Journal for Research

E-ISSN: 3048-7641     Impact Factor: 9.11

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जनपद बागेश्वर की सूर्य प्रतिमाः प्रतिमाशास्त्रीय अध्ययन

Author(s) शालिनी पाठक
Country India
Abstract वैदिक काल मंे सूर्य की गणना प्रमुख देवता के रूप मंे होती थी। ऋग्वेद1 मंे ‘सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च‘ का उल्लेख है, अर्थात सूर्य समस्त जगत की आत्मा है। ऋग्वेद2 मंे एक अन्य स्थान पर सूर्य को उषा द्वारा लाया गया चमकीला अश्व कहा गया है, तथा एक, सात या अगणित अश्वों युक्त रथ का उनका वाहन बताया गया है।3 उत्तर वैदिक कालीन गं्रथों मंे भी सूर्य का उल्लेख प्राप्त होता है। अथर्ववेद4 मंे सूर्य को शारीरिक व्याधियों का हरण करने वाला कहा गया है।
सूर्य प्रतिमा की प्रतिष्ठा के सन्दर्भ मंे वृहत्तसंहिता5 में उल्लेखित है कि इनकी प्रतिष्ठा मग करें। भविष्यपुराण6 मंे उल्लेखित कथा के अनुसार जाम्बवती से उत्पन्न कृष्ण पुत्र साम्ब द्वारा मूलस्थान (आधुनिक मुल्तान) मंे चन्द्रभागा (चेनाब) के तट पर निर्मित सूर्य मंदिर का पुरोहित पद स्थानीय ब्राह्मणों द्वारा स्वीकार न किए जाने पर शकद्वीप के मगों को पुरोहित पद प्रदान किया गया। गया जिले मंे गोविन्दपुर के शक सम्वत् 1058 के अभिलेख मंे मगों का साम्ब द्वारा लाया जाना उल्लेखित है।7 नदी के तट पर निर्मित सूर्य मंदिर का उल्लेख हृवेनसांग द्वारा भी किया गया है।8 कुषाण नरेश कनिष्क की मुद्राओं पर ’मिइरो’ नाम अंकित है, जिसका तादात्म्य ईरानी मिहर से किया जाता है, जो एक सूर्य पूजक सम्प्रदाय था। इन साक्ष्यों के आधार पर भण्डारकर का मत है कि कनिष्क काल मंे यह सम्प्रदाय भारत मंे प्रचलित हुआ।9
Field Sociology > Archaeology / History
Published In Volume 7, Issue 2, March-April 2026
Published On 2026-03-02

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