Advanced International Journal for Research

E-ISSN: 3048-7641     Impact Factor: 9.11

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प्राचीन भारत में नारी शिक्षा

Author(s) सिम्पल कुमारी
Country India
Abstract भारतीय संस्कृति में स्त्रियों को सदैव से ही अत्यंत सम्मानजनक एवं प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त था। किसी भी समाज एवं राष्ट्र की प्रगति और समृद्धि का मापक उसकी स्त्रियों की स्थिति होती है, यदि नारी शिक्षित है तो वह न केवल अपने परिवार को बल्कि समाज की संपूर्ण चेतना, दिशा और गति को निर्धारित करने वाला आधार है। भारत एक विकासशील देश है, इस सभ्यता के समुचित ज्ञान के लिए शिक्षा पद्धति का अध्ययन करना आवश्यक है, जिसने इस सम्यता को चार हजार वर्षों से भी अधिक समय तक सुरक्षित रखा। इसका प्रचार-प्रसार किया। भौतिक तथा आध्यात्मिक उत्थान तथा विभिन्न उŸारदायित्व के निर्वाह के लिए शिक्षा की महŸाा को सदा स्वीकार किया गया। मनुष्य जब बर्बर एवं जंगली स्वरूप में रहा तब भी शिक्षा किसी न किसी रूप में विद्यमान रही होगी, लेकिन अपरिपक्व व अविकसित थी।
विद्या सम्बन्धी समस्त गुणों को निरूपण करने पश्चात् भारतीय मनिषियों ने घोषित किया कि विद्या विहीन मनुष्य पशु तुल्य है। वैदिक युग से ही शिक्षा को प्रकाश का स्त्रोत माना गया है, इस काल में नारी को पुरूषों के समान ही शिक्षा का अधिकार प्राप्त था, वेदों का अध्ययन करे, शास्त्रों में पारंगत हो और समाज में विचारक की भूमिका निभाए। उच्च वर्ग की महिलाएं गार्गी, मैत्रेयी, घोषा, लोपमृदा इस युग की उपलब्धियां थी। गार्गी वृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवलक्य के साथ दार्शनिक संवाद। कुछ वैदिक धर्मसूत्रीय परम्पराओं और बाद के गं्रथों में कन्याओं के उपनयन अथवा ब्रह्मचर्य से सम्बन्धित उल्लेख मिलता है।
प्राचीन समय में शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान या उपाधि तक सीमित न रहकर अनेक प्रकार से जैसे औपचारिक शिक्षा- वेद, धर्म, व्याकरण साहित्य। व्यवहारिक/कलात्मक शिक्षा-संगीत, नृत्य, चित्रकला, ग्रह प्रबंधन आदि। धार्मिक शिक्षा-धार्मिक अनुष्ठान, दर्शन, तप, आध्यात्मिक ज्ञान है। राजपरिवार की कन्याओं को सैनिक एवं प्रशासनिक, राजकीय आदि शिक्षा भी दी जाती थी। ऐसे महिलाओं के उल्लेख मिले है, जिसने आवश्यकता पर कुशल प्रशासनिक क्षमता का परिचय दिया। सातवाहन राजवंशी नागनिका ने अपने पति की मृत्यु के पश्चात् अपने अल्पवयस्क पुत्रों की संरक्षिका बनकर कुशलतापूर्वक शासन किया। गुप्त काल में कुमारदेवी के सिक्कों से पता चलता है कि इन्हें राजकीय संरक्षण प्राप्त था।
वात्सायन के कामसूत्र में 64 कलाओं का उल्लेख सुंस्कृत महिलाओं के लिए अनिवार्य बताया गया है, इसके अतिरिक्त कादंबरी शुक्र नितिसार, ललितविस्तार आदि में 64 कलाओं का उल्लेख है। प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति का उद्देश्य- चरित्र निर्माण, ब्रह्मचर्य का पालन, आत्मसंयम का विकास, शिक्षा में आध्यात्मिक भावना, शिक्षा द्वारा व्यक्तित्व निर्माण, विकास और उन्नति, समाज के प्रति उŸारदायित्व, प्राचीन भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं की रक्षा आदि।
प्राचीन भारत में नारी शिक्षा, वैदिक काल व उसके विकासक्रम गुप्तकाल तक प्रस्तुत करना है कि उस समय महिला शिक्षा उच्च वर्ग की महिलाओं तक सीमित था व समय के साथ-साथ परिवर्तनशील रही थी।
Keywords प्राचीन भारत, नारी शिक्षा, वैदिक सभ्यता, स्त्रोत आदि।
Field Sociology
Published In Volume 7, Issue 5, September-October 2026
Published On 2026-09-12

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