Advanced International Journal for Research

E-ISSN: 3048-7641     Impact Factor: 9.11

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भारतीय संगीत में ताल की अवधारणा एवं स्वरूप

Author(s) Biswajit Sahu
Country India
Abstract भारतीय संगीत परंपरा में ताल की अवधारणा अत्यंत प्राचीन एवं मौलिक है। सृष्टि के प्रारंभ से ही प्रकृति के प्रत्येक घटक में समय, क्रम और लयात्मकता निहित रही है, जिसका प्रतिबिंब मानव चेतना तथा सांगीतिक अभिव्यक्तियों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक ताल भारतीय संगीत का आधार स्तंभ रहा है। वेदों में वर्णित छंद व्यवस्था, ह्रस्व–दीर्घ–प्लुत मात्राएँ तथा सामवेद की गायन परंपराएँ ताल के प्रारंभिक स्वरूप को इंगित करती हैं।
भरतमुनि के नाट्यशास्त्र एवं अभिनवगुप्त की अभिनवभारती में ताल सिद्धांत का दार्शनिक एवं प्रयोगात्मक विवेचन प्राप्त होता है। आगे चलकर मातंग मुनि, शारंगदेव, अहोबल आदि आचार्यों ने ताल को मार्गी एवं देशी परंपराओं में वर्गीकृत कर उसे व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। कालांतर में भारतीय संगीत की दो प्रमुख धाराओं— कर्नाटक एवं हिंदुस्तानी— में ताल की भिन्न-भिन्न अवधारणाएँ विकसित हुईं। कर्नाटक संगीत में जाति एवं गति के माध्यम से तालों का सूक्ष्म वर्गीकरण मिलता है, जबकि हिंदुस्तानी संगीत में मात्रा, विभाग, ताली-खाली एवं ठेका की प्रणाली प्रमुख है।
यह शोध लेख भारतीय ताल परंपरा की ऐतिहासिक, दार्शनिक एवं प्रयोगात्मक पृष्ठभूमि का विश्लेषण करते हुए यह प्रतिपादित करता है कि ताल न केवल संगीत की संरचनात्मक आधारशिला है, अपितु संपूर्ण सृष्टि की लयात्मक चेतना का प्रतीक भी है। ताल के बिना संगीत की रसात्मकता एवं सौंदर्य की कल्पना संभव नहीं है।
Keywords ताल, लय, मात्रा, छंद, सामवेद, नाट्यशास्त्र, मार्गी एवं देशी ताल, कर्नाटक ताल पद्धति, हिंदुस्तानी ताल पद्धति, ठेका, जाति एवं गति, भारतीय संगीत
Field Arts > Movies / Music / TV
Published In Volume 6, Issue 6, November-December 2025
Published On 2025-12-31
DOI https://doi.org/10.63363/aijfr.2025.v06i06.2767
Short DOI https://doi.org/hbhk34

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